रियासतकाल से ही झालावाड़ की हिकमत की देशभर में थी पहचान, महामारी में भी बचाई थी जानें

न्यूज ओरियम, झालावाड़।

आज मेडिकल साइंस ने चाहे कितनी भी तरक्की कर ली हो, लेकिन फिर भी झालावाड़ की हिकमत यानी यूनानी दवाईयों का कोई मुकाबला नहीं रहा है। रियासतकाल में भी यहां की हिकमत की देशभर में धूम थी। महामारी के समय तो यूनानी दवाईयों ने बड़ी संख्या में लोगों की जान बचाई थी। समाजवादी नेता सर्वेश्वरदत्त का आलेख है कि झालावाड़ में तत्कालीन नरेश भवानी सिंह के इलाज के दौरान टोंक से आए हुए हकीम शम्सुर्रहमान की खास दवाई जवाहिर मोहरा ने दरबार को राहत पहुंचाई ।
हक़ीम साहब टोंक शम्सुर्रहमान न केवल राजपरिवार के लिए बल्कि झालावाड़ के रहवासी गरीब मज़लूमों के लिए भी काम करते थे। उनकी दवाईयों में जो शिफा थी वह लोगों को कहीं नहीं मिलती थी। इसीलिए आज भी उनका नाम झालावाड़ में बड़े अदब से लिया जाता है।शरीर से भारी भरकम रंग में एक दम काले और बड़ी बड़ी लाल आंखें उस पर उनकी भारी आवाज के साथ ठहाकेदार जोरकी हंसी पूरे मोहल्ले को गुंजाने वाली थी।उनका मकान नमक वाले सेठ स्व. आनंदी लाल से सटा हुआ है।जिस मकान में हक़ीम निवास करते थे,वो मकान उन्हें ठाकुर उमराव सिंह ने बतौर रिहायशी बख़्शिश में दिया था। जिसमें आज भी उनके छोटे पुत्र स्व. इकरामुर्रहमान उर्फ़ बल्ले भय्या का परिवार निवास करता है। बल्ले भय्या झालावाड़ नगर पालिका में नाकेदार थे और इलाज -हिक़मत के काम से वे कौसो दूर रहे। लेकिन हक़ीम .शम्सुरर्हमान के बड़े सुपुत्र अमानुतुर्रहमान उर्फ बड़े भय्या इलाज और हिक़मत के पेशे में पूर्ण पारंगत होने के साथ ख्यातिनाम थे।उनकी पत्नि भी हिक़मत और हिकमानी के काम से अंत तक जुड़ी रहीं और वे महिला रोग विशेषज्ञ थी। लेकिन वे सख़्त पर्दानशीं थी। हक़ीम अमानुतुर्रहमान साहब का इंतकाल झालावाड़ में हुआ वे कैंसर से पीड़ित थे। वह कांग्रेस उम्मीदवार के झालावाड़ नगर पालिका के सदस्य भी चुने गए थे।

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